
जांच में सामने आया कि परमानंद गुप्ता ने एक दलित महिला की पहचान का उपयोग करते हुए कई झूठे SC/ST केस दर्ज कराए थे। इन मामलों में रेप और उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे, जो बाद में जांच में फर्जी पाए गए। अदालत ने माना कि यह कानून की आड़ में निजी हित साधने की कोशिश थी।
Lucknow High Court ने अपने आदेश में कहा कि झूठे SC/ST केस समाज में असमानता और विभाजन को बढ़ावा देते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भविष्य में ऐसे किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा जो इस तरह के गंभीर कानून का गलत इस्तेमाल करेगा। अदालत ने वकील को 12 साल की सज़ा के साथ ₹45,000 का जुर्माना भी लगाया है।
यह फैसला समाज के लिए एक बड़ा संदेश है कि झूठे SC/ST केस दर्ज करने वाले अब कानून की पकड़ से नहीं बच पाएंगे। अदालत ने कहा कि ऐसे फर्जी मुकदमों से न केवल निर्दोष लोग प्रभावित होते हैं, बल्कि वास्तविक पीड़ितों को भी न्याय से वंचित रहना पड़ता है। इसलिए इस तरह के मामलों पर अब अदालतें विशेष नजर रखेंगी।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय न्याय प्रणाली में पारदर्शिता और जिम्मेदारी बढ़ाने वाला साबित होगा। Lucknow High Court की यह सख्ती आने वाले समय में झूठे मुकदमों को लेकर एक मिसाल कायम करेगी।
झूठे SC/ST केस
पूरा मामला अब लोगों में जागरूकता का विषय बन चुका है। Hindustan Times Lucknow और The Print Judiciary Section ने भी इस केस को “कानून के दुरुपयोग पर निर्णायक प्रहार” बताया है।
यह फैसला न केवल झूठे मामलों के खिलाफ कार्रवाई का प्रतीक है, बल्कि यह चेतावनी भी है कि न्याय का हथियार केवल सत्य के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए। ऐसे में साबरमती एक्सप्रेस मर्डर केस जैसे अन्य मामलों की तरह, यह निर्णय भी न्याय व्यवस्था में भरोसा बढ़ाने वाला माना जा रहा है।